सत्यभामा और रुक्मिणी में कौन है श्रेष्ठ – श्रीकृष्ण तुलाभरम कथा

सत्यभामा और रुक्मिणी में कौन है श्रेष्ठ – श्रीकृष्ण तुलाभरम कथा

सत्यभामा राजा सत्यजीत की सुंदर बेटी थी और श्री कृष्ण की प्रमुख पत्नियों में से एक थीं परंतु उसे अपने राजघराने की संपत्ति का बहुत अभिमान था। दूसरी ओर, रुक्मिणी द्वारका की पहली रानी और देवी लक्ष्मी का वास्तविक अवतार थी, फिर भी वह बहुत विनम्र और विचारशील थीं।

आज के इस हम आपको इन दो रानियों के सच्चे चरित्र की कहानी बताने जा रहें हैं और यह कहानी अंत में आपको नैतिकता का पाठ भी सिखाएगी

एक दिन देवऋषि नारद भगवान कृष्ण को अभिवादन करने के लिए द्वारका आए, लेकिन जाने से पहले वह महल की रानियों से मिलने गए। और वहां उनकी भेंट रानी सत्यभामा से हुई जो स्वयं का फूलों से श्रृंगार कर रही थी

देवर्षि ने सत्यभामा को बताया की वो दिखने में सबसे सुंदर है और फिर भी श्री कृष्ण रुक्मिणी को ही पसंद करते है। देवर्षि के शब्दों से चकित हुई रानी ने उनसे पूछा की वो ऐसा क्या करें की श्री कृष्ण का ध्यान सिर्फ उनपे ही टिका रहें

इस पर देवर्षि नारद ने उसे बताया की वो भगवान कृष्ण को उन्हें सौंप दें। और उन्हें वापस प्राप्त करने के लिए तुलाभरम की विधि करें। तुलाभरम एक ऐसी विधि है जिसमे व्यक्ति के वजन के बराबर धन से तोला जाता है

इसके बाद, देवर्षि ने उसे आश्वासन दिया की वो श्री कृष्ण को स्वयं के पास रख सकती है। परतुं देवर्षि नारद को एक बात की चिंता होने लगी की श्री कृष्ण जगन्नाथ है और सत्यभामा के पास भगवान कृष्ण को तोलने के लिए उनके वजन के इतना पर्याप्त धन नहीं होगा

हमेशा की तरह अपने अभिमान में सत्यभामा इस टिप्पणी से नाराज हुई और उसने इसे एक चुनौती के रूप में ले लिया। रुक्मिणी को छोड़कर सभी अन्य रानियों के बीच और स्वयं भगवान कृष्ण को साक्षी बनाकर सत्यभामा ने श्री कृष्ण को देवर्षि नारद को दान कर दिया। जिससे सभी अचम्भित हुए

इसके बाद देवर्षि नारद ने सत्यभामा को तुलाभरम का संचालन करके भगवान कृष्ण को वापस लेने का अवसर दिया। भगवान कृष्ण को अनुरोध किया गया था कि वह तुला के एक बाजु के मापन में बैठें और दूसरी बाजु में सत्यभामा ने अपने सभी गहने और अन्य सोने के आभूषणों को जमा करना शुरू कर दिया।

सत्यभामा ने अपने सारे गहने और आभूषण रख दिए, परंतु तुला पर इनका कुछ भी परिणाम नहीं हुआ। इसके बाद उसने अन्य रानियों से उनके गहने रखने की मांग की और अन्य रानियों ने श्री कृष्ण के प्रति अपनी भक्ति के कारण यह बात मान भी ली परन्तु श्री कृष्ण का मापन अपने स्थान से जरा भी नहीं हिला

सत्यभामा के इस वचन के कारण भगवान कृष्ण भी परेशान हो गए थे। तभी सत्यभामा को अपने भूल पता चली और उसने अपने अभिमान को निगल लिया और सीधे रुक्मिणी के कक्ष में पहुंची ताकि वह उनसे मदद मांग सके।

रुक्मिणी ने उसे शांत किया और उसकी मदद करने के लिए राजी हो गई। जैसे ही वह सभा भवन की और बढ़ी उसने वृंदावन से तुलसी के पत्ते तोड़ लिए और मार्ग से जाते जाते भगवान का नामस्मरण करती रहीं

रुक्मिणी ने बड़ी शांति से स्वर्ण से भरे मापन में तुलसी के एक पत्ते को रखा। जैसे ही उसने तुलसी के पत्ते को रखा भगवान कृष्ण का मापन ऊपर उठने लगा और तुला संतुलित हुई

११ इस तरह रुक्मिणी ने अपनी निर्मल भक्ति और प्रेम से दिव्य शक्ति को प्राप्त कर लिया। आपको यह ब्लॉग कैसे लगा हमें कमेंट बॉक्स में बताइये और ऐसे अधिक ब्लॉग देखने के लिए अर्था चॅनेल से जुड़े रहें

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